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सुहाने वो दिन (कविता)

सुहाने वो दिन (कविता) (कवि: A. Asad) उमंगों में डूबे जवानी के दिन, हर लम्हा था जैसे कहानी के दिन। हँसी थी, ठहाके थे, सपने नए, कभी आँधियाँ, तो कभी रंग नए। सुहाना सफ़र था, बहारों का साथ, दिलों में न थी कोई शिकवा-ओं की बात। वो मस्ती, वो ख़्वाबों का आलम कहाँ, अब तन्हा सहर है, वो मौसम कहाँ? वो कॉलेज की गलियाँ, वो यारों की टोली, हर शाम लगती थी जैसे रंगोली। कभी चाय की चुस्की, कभी प्यार की बात, हर एक मोड़ पर बस मिलती थी सौग़ात। अब तन्हाई से जब भी नजरें मिलाते वो बीते ज़माने बहुत याद आते कहाँ खो गए अब पुराने वो दिन सुहाना सफ़र था सुहाने वो दिन।

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