Skip to main content

ये देश है हमारा। (कविता)

ये देश है हमारा।  (कविता)

जब तक लहू रगों में
और सांस चल रही है
मेरे वतन की खुशबू
सांसों में बस रही है

हम बागबान वतन के
कांटे हमारा बिस्तर 
हमने लहू से सींचा
तारीख़ कह रही है

तारीख़ के वरक पर
स्याही नहीं लहू है
रोया है आसमां भी
धरती ये कह रही है

कितनों ने लाल खोए
कितनों ने सहारे
तब जा के पाई सरहद
तब मिल सका किनारा

जन्नत है ये हमारी
हमने इसे निखारा
ज़ख्मों के फूल दे कर
हमने इसे संवारा 

तुम आज फिर से बोलो
जय-हिंद का ये नारा
ये देश "असद" हमारा 
हमें जान से है प्यारा ।


 

Comments

Popular posts from this blog

Happy Diwali

 

मैं भारत हूं। (कविता) , कवि - अब्दुल असद

कविता – "मैं भारत हूँ" कवि – अब्दुल असद कभी-कभी कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं होती, वह एक आत्मा की उद्घोषणा बन जाती है। "मैं भारत हूँ" ऐसी ही एक कविता है — जहाँ कवि स्वयं को राष्ट्र के रूप में अनुभव करता है, और फिर उसकी हर श्वास, हर भाव, हर शब्द… भारत की संपूर्ण चेतना बन जाता है। यह कविता एक रूपक (Metaphor) पर आधारित है — एक विस्तारित रूपक, जिसमें "मैं" कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि हर वह नागरिक है जो देश से प्रेम करता है, देश के लिए जीता है, और उसमें स्वयं को पाता है। यह कविता बताती है कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि एक भावना है — जो हर सैनिक की वर्दी में, हर किसान की मिट्टी में, हर माँ की प्रार्थना में और हर बच्चे के स्वप्न में जीवित है। "मैं भारत हूँ" — यह कहना अपने अस्तित्व को मिटाकर किसी व्यापक पहचान में विलीन होना है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि भारत हमारे बाहर नहीं, हमारे भीतर है। हमारी चेतना, हमारी भाषा, हमारे त्याग और हमारे स्वप्न — यही भारत है। यह कविता हर उस व्यक्ति की आवाज़ है, जो स्वयं को भारत से अलग नहीं समझता — क्यो...

लफ़्ज़ों की छाँव (ग़ज़ल) शायर: अब्दुल असद

अब्दुल असद प्रस्तुत करते हैं — “लफ़्ज़ों की छाँव” एक ऐसी भावपूर्ण ग़ज़ल, जिसमें रिश्तों की गर्माहट, उम्मीद की रोशनी और मुस्कुराहट की ताक़त को सरल शब्दों में पिरोया गया है। यह रचना जीवन की कठिनाइयों के बीच प्रेम, धैर्य और सकारात्मकता बनाए रखने का संदेश देती है।